जिदंगी

 ज़िन्दगी की तन्हाइयों में 

एक सवेरा निकलता है 

उड़ते हुए परिंदो को 

एक आसरा मिलता है

गहरे होते ज़ख्मों पर 

एक आह निकलती है

मेरी किस्मत के ताले पर 

कोई चाभी नहीं आती है 

ज़िन्दगी की भीड़ में 

खुद को खोजते फिरता हूं 

मिलूंगा भी की नहीं 

यही सोचते रहता हूं

खुद की भावनाओं को कागज पर लिखता हूं 

फिर फाड़ कर उसे 

कचड़े में डालता हूं 

ज़िन्दगी से उब कर 

मौत की तलाश में हूं 

अपनी ज़िन्दगी की कहानी में 

भटका हूं पक्षी हूं 

संभाल लो कोई मुझे 

इस आस में बैठा हूं।

    

               - राहुल "गुमनाम शख़्स"







Comments

Post a Comment

Popular Posts